समर्थन में उतरे अमलतास और स्कीम-136 के रहवासी, आईडीए के खिलाफ प्रदर्शन के बीच पहुंचे विधायक रमेश मैंदौला, आज से धरना शुरू करने की चेतावनी
इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) द्वारा गुलमोहर कॉम्प्लेक्स में विस्थापितों को बसाने के निर्णय के खिलाफ स्थानीय रहवासियों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। अब इस विरोध को पूरे क्षेत्र का व्यापक जन समर्थन मिलने लगा है। गुलमोहर कॉम्प्लेक्स के निवासियों के साथ ही पास की अमलतास कॉलोनी और योजना क्रमांक-136 के रहवासी भी इस फैसले के खिलाफ मैदान में उतर आए हैं। बुधवार सुबह गुलमोहर कॉम्प्लेक्स के सामने बड़ी संख्या में एकत्रित हुए लोगों ने इंदौर विकास प्राधिकरण के खिलाफ जमकर नारेबाजी और प्रदर्शन किया।क्षेत्र में बढ़ते जनाक्रोश और तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए स्थानीय विधायक रमेश मैंदौला प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचे। उन्होंने रहवासियों की समस्याओं को ध्यान से सुना और आश्वस्त किया कि वे इस संवेदनशील मामले में आईडीए के वरिष्ठ अधिकारियों से सीधी बात करेंगे। इस दौरान उनके साथ पार्षद मनोज मिश्रा, अंकित सीमा चौधरी और भाजपा महामंत्री सुधीर कोल्हे सहित कई स्थानीय जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहे, जिन्होंने रहवासियों की मांगों से सहमति जताई।दूसरी ओर, आईडीए मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) डॉ. परिक्षित झाड़े के खिलाफ रहवासियों की नारेबाजी बुधवार को भी जारी रही। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो गुरुवार से अनिश्चितकालीन धरना आंदोलन शुरू किया जाएगा। इससे पहले सोमवार और मंगलवार को भी भारी संख्या में रहवासियों ने आईडीए कार्यालय और जनसुनवाई में पहुंचकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं और ज्ञापन सौंपा था। रहवासियों का कहना है कि यदि प्राधिकरण ने अपनी मनमानी नहीं रोकी, तो वे भूख हड़ताल, पुतला दहन और प्राधिकरण कार्यालय पर उग्र प्रदर्शन करने के लिए विवश होंगे।-. फ्लैट्स की संख्या और कानूनी पेच की आशंका, रहवासी संघ के पदाधिकारियों ने इस पूरी योजना की व्यावहारिक कमियों को उजागर करते हुए कानूनी विवाद की आशंका जताई है। संघ के अनुसार एलआईजी श्रेणी के गुलमोहर कॉम्प्लेक्स में कुल 334 फ्लैट्स निर्मित हैं, जिनमें से वर्तमान में केवल 90 फ्लैट्स ही खाली हैं। इन फ्लैट्स का आकार 667 वर्ग फीट है। इसके विपरीत, जिन विस्थापित परिवारों को यहां बसाने की तैयारी की जा रही है, उनकी संख्या 200 से अधिक है। ऐसे में सभी परिवारों को यहां समायोजित करना पूरी तरह असंभव है, जिससे आने वाले समय में गंभीर कानूनी पेच फंसना तय है।इस समस्या के समाधान के लिए रहवासियों ने प्राधिकरण के समक्ष एक व्यावहारिक विकल्प भी रखा है। उनका कहना है कि इंदौर के अन्य क्षैत्रों में भी फ्लैट बने हुए है। जो कि नगर निगम ने बनाए है उन्हें वहां बसाया जा सकता है। यहा आईडीए नया भवन बनाने तक उन्हें किराया दे कर हटाऐ और नए फ्लैट बना कर दे सकता है। गुलमोहर काम्प्लैक्स के रहवासियों के बाद अब पास ही नवनिर्मित अमलतास कॉम्प्लेक्स बहुमंजिला इमारत के रहवासियों ने भी विरोध शुरू कर दिया है। इनके समर्थन में स्कीम नंबर 136 के रहवासी भी आ गए है। – बुनियादी सुविधाओं पर संकट और रख-रखाव के नियमों पर उठे सवालआंदोलन कर रहे नागरिकों ने इंदौर विकास प्राधिकरण पर निर्माण की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। रहवासियों का कहना है कि कॉम्प्लेक्स में वर्तमान में ही पानी की भारी किल्लत बनी हुई है और देखरेख के अभाव में लिफ्ट अक्सर बंद रहती है। ऐसे में नए परिवारों के आने से व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। आरोप है कि प्राधिकरण अपने न बिकने वाले फ्लैट्स विस्थापितों को सौंपकर अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाना चाहता है।इसके अलावा, सबसे बड़ा विवाद मेंटेनेंस शुल्क को लेकर है। रहवासियों के अनुसार, विस्थापितों से हर महीने 1500 से 2000 रुपये का मेंटेनेंस शुल्क वसूलने और अतिरिक्त पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने की गारंटी लेने के लिए प्राधिकरण का कोई भी अधिकारी तैयार नहीं है, जिससे भविष्य में आंतरिक विवाद बढ़ने का खतरा है।- राजनैतिक दबाव के आरोप, भविष्य में नई परिपाटी से सरकार के लिए संकट की स्थितिसूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आगामी सिंहस्थ के मद्देनजर एमआर-11 और एमआर-12 रोड के निर्माण कार्य में तेजी लाने के लिए क्षेत्रीय विधायक और मंत्री तुलसीराम सिलावट के दबाव में यह पूरी कार्रवाई की जा रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि मंत्री अपने समर्थकों को एलआईजी श्रेणी के बड़े फ्लैट दिलवाने के लिए आईडीए पर राजनीतिक दबाव बना रहे हैं।प्रशासनिक और राजनैतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम भविष्य के लिए एक गलत नजीर पेश कर सकता है। अब तक की व्यवस्था के अनुसार विस्थापित परिवारों को केवल ईडब्ल्यूएस श्रेणी के छोटे मकान ही आवंटित किए जाते रहे हैं। यदि इस मामले में गुलमोहर कॉम्प्लेक्स ओर अमलताश के एलआईजी फ्लैट्स विस्थापितों को दिए जाते हैं, तो यह एक ऐसी नई परिपाटी की शुरुआत होगी, जिसके बाद प्रदेश भर के विस्थापित बड़े फ्लैटों की मांग करने लगेंगे। जानकारों के मुताबिक, यह नीतिगत बदलाव आगे चलकर राज्य की मोहन यादव सरकार के लिए एक बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय संकट खड़ा कर सकता है।
