इंदौर। कभी-कभी कुछ फैसले इंसान को अमर बना देते हैं। 25 वर्षीय गौरव दवे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका दिल आज भी धड़क रहा है… उनकी किडनियां, लिवर और अन्य अंग कई जरूरतमंदों के शरीर में नई जिंदगी बनकर धड़क रहे हैं। इंदौर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह शहर सिर्फ स्वच्छता ही नहीं, बल्कि मानवता में भी देश के लिए मिसाल है।खजूरी बाजार निवासी और पेशे से फिल्म कास्टिंग कोऑर्डिनेटर गौरव दवे को 13 जुलाई को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उनका मस्तिष्क काम करना बंद कर गया और दो चरणों की चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाद उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया।परिवार के सामने दुखों का पहाड़ था, लेकिन इसी कठिन घड़ी में गौरव की बहन वैदेही राठी, बहनोई पलकेश राठी और भाई रितिक चावरे ने अंगदान का सुझाव रखा। पिता सतीश दवे और मां कविता दवे ने भारी मन से वह फैसला लिया, जिसने कई अनजान परिवारों के जीवन में खुशियां लौटा दीं।गौरव का हृदय 68वें ग्रीन कॉरिडोर के जरिए अहमदाबाद के यू.एन. मेहता अस्पताल भेजा गया, जहां 28 वर्षीय मरीज को नई जिंदगी मिली। वहीं उनका लिवर इंदौर के 42 वर्षीय मरीज को प्रत्यारोपित किया गया और दोनों किडनियां 22 और 52 वर्षीय महिला मरीजों के शरीर में नई उम्मीद बनकर पहुंचीं।हालांकि उनके फेफड़े चेन्नई भेजे जाने थे, लेकिन समय पर लॉजिस्टिक व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण उनका प्रत्यारोपण नहीं हो सका। इसके अलावा हार्ट वाल्व, पैंक्रियाज और छोटी आंत के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रक्रिया पूरी की गई।अहमदाबाद से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम इंदौर पहुंची और वरिष्ठ चिकित्सकों की निगरानी में पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई। ट्रैफिक पुलिस ने विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाकर अंगों को समय पर अस्पतालों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।गौरव इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी धड़कनें आज भी कई जिंदगियों में जिंदा हैं। उनका परिवार शोक में डूबा जरूर है, लेकिन उनके साहसिक फैसले ने यह संदेश दिया है कि अंगदान सिर्फ एक दान नहीं, बल्कि किसी के जीवन को दूसरा जन्म देने का सबसे बड़ा माध्यम है।श्रद्धांजलि…”शरीर मिट जाता है, लेकिन नेक फैसले हमेशा अमर रहते हैं।”गौरव दवे को भावभीनी श्रद्धांजलि।
