
सालों लग जाते हैं एक घर बनाने और बसाने में, शताब्दी लग जाती है एक बस्ती की अलग पहचान बनाने में और सदियों का इतिहास शामिल होता है उस जगह को पूजनीय कहने में, पर विकास के नाम पर विस्तार की बात करने वाले प्रशासनिक अमले को चंद मिनट भी नहीं लगते उन इमारतों को गिरा देने में, जहाँ इतिहास अपनी छाप छोड़कर यहाँ तक बढ़ पाया है। और इस मामले में इन्दौर अव्वल है, जहाँ पुरानी बस्तियों में सड़क चौड़ीकरण व अतिक्रमण के नाम पर कभी बियाबान, कभी खजूरी बाज़ार, कभी कनाड़िया रोड तो कभी मालवीय नगर ध्वस्त कर दिया जाता है। आख़िर पुरातन शहर को सहेजने का सलीका अफ़सरशाही को क्यों समझ नहीं आता?शहर इन्हीं बस्तियों, मोहल्लों और इमारतों के कारण ही आबाद है, इन्हीं में रहने वालों का दर्द, परिवार की चिंता, ईंट-पत्थरों की जुड़ाई और खपरैल से सीमेंट तक का सफ़र तय हुआ है, परिवारों के चूल्हे-चौके पर सालों साल और कई पीढ़ियों को पाल-पोस कर बड़ा किया है। आज यही इमारतें खोखले विकास की भेंट चढ़ रही हैं। आख़िर क्यों?दिल्ली में एक क्षेत्र है ‘हौजखास गाँव’, वहाँ दिल्ली सरकार ने विकास के नाम पर उस क्षेत्र की बलि नहीं ली, बल्कि उस गाँव को आधुनिकता के साथ संरक्षित कर व्यापार-व्यवसाय का बेहतरीन उदाहरण बना दिया, वहाँ की गलियों में कपड़े भी मिलते हैं तो खाने-पीने की सैंकड़ों दुकाने भी हैं, पर सबकुछ उस गाँव के मूल स्वरूप के साथ है, जिनमें तंग गलियाँ हैं, अधिकतम दो-तीन मंज़िला घर हैं, छोटे दरवाज़े वाले रेस्टोरेंट हैं, पनघट और जीने से झाँकती सभ्यता है, गोबर से सना भैंसों का बाड़ा भी है। वहाँ भी तो शहर में गाँव ज़िंदा रखा है, फिर इन्दौर क्यों अछूता है?विकास का ऐसा मास्टरप्लान बनता है, जिसमें इतिहास के पन्ने फाड़े जाते हैं, और फिर खोखले विकास की तस्वीरों पर जनप्रतिनिधियों का मौन तो देखने लायक होता है। अब शहर में ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद वाले जन नेता भी पैदा नहीं होते, जिनकी आत्मा शहर की पहचान छीनने पर भी नहीं काँपती और न ही जनता आक्रान्तित होती है, जो यह नहीं समझ रही कि कल बियाबानी था, आज छावनी है और कल आपका क्षेत्र भी हो सकता है। शहर के लोग तब भी ख़ामोश रहते हैं, जब सरकार ने ‘उज्जैन-इंदौर मेट्रो पॉलिटियन रीज़न’ नाम घोषित कर दिया और अब भी ख़ामोश है जब छावनी के रहवासियों की सिसकियाँ निकल रही हैं। इन्दौर क्या ज़िंदा लोगों का शहर नहीं रहा…? उत्तर सीधा और साफ़ है कि हाँ! अब इन्दौर भी मृत हो गया है।
*हालात ए इन्दौर*
*डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’* पत्रकार एवं लेखक, इन्दौर


